अंतरिक्ष का सफर, रॉकेट की उड़ान से लेकर चाँद पर लैंडिंग और धरती पर वापसी तक की पूरी कहानी

जब भी हम रात के समय आसमान की ओर देखते हैं, तो तारों और चमकते चाँद को देखकर मन में कई सवाल उठते हैं। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह होता है कि इंसान की बनाई हुई एक मशीन, जिसे हम रॉकेट कहते हैं, वह कैसे गुरुत्वाकर्षण की बेड़ियों को तोड़कर चाँद तक पहुँच जाती है? यह सिर्फ लोहे और तारों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह भौतिक विज्ञान, गणित और इंसान की कभी न हार मानने वाली जिद का एक जीता-जागता सबूत है।
रॉकेट कैसे उड़ता है?
जब आप किसी गुब्बारे में हवा भरकर उसे अचानक छोड़ देते हैं, तो हवा पीछे की तरफ तेजी से निकलती है और गुब्बारा आगे की तरफ भागता है। रॉकेट के उड़ने का पूरा विज्ञान इसी एक साधारण से सिद्धांत पर टिका है, जिसे हम आइजैक न्यूटन के गति के तीसरे नियम के नाम से जानते हैं, “हर क्रिया की एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है”
रॉकेट के इंजनों में जब ईंधन और ऑक्सीडाइज़र को मिलाया जाता है, तो एक बहुत बड़ा और नियंत्रित विस्फोट होता है। इस विस्फोट से पैदा होने वाली गर्म गैसें रॉकेट के निचले हिस्से (नोज़ल) से भयंकर दबाव के साथ नीचे की तरफ निकलती हैं। यह गैसों का नीचे की ओर जाना “क्रिया” है, और इसके जवाब में धरती से मिलने वाला वह धक्का जो रॉकेट को ऊपर आसमान की ओर धकेलता है, उसे “प्रतिक्रिया” कहते हैं।
लेकिन अंतरिक्ष में जाने के लिए सिर्फ उड़ना काफी नहीं है। हमारी पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हर चीज़ को अपनी तरफ खींचता है। इस खिंचाव से पूरी तरह आज़ाद होने के लिए रॉकेट को एक खास गति हासिल करनी होती है जिसे पलायन वेग कहते हैं। रॉकेट के लिए यह गति लगभग 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड (यानी करीब 40,000 किलोमीटर प्रति घंटा) है। अगर रॉकेट इस गति को हासिल नहीं करेगा, तो वह वापस धरती पर गिर जाएगा। इसीलिए शुरुआत में रॉकेट को अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ती है।
रॉकेट में कितना ईंधन लगता है?
अगर आप सोचते हैं कि रॉकेट के अंदर बहुत सारी जगह होती है जहाँ अंतरिक्ष यात्री आराम से टहलते होंगे, तो आप गलत हैं। सच्चाई यह है कि जब एक रॉकेट लॉन्च पैड पर खड़ा होता है, तो उसके कुल वजन का लगभग 85% से 90% हिस्सा सिर्फ और सिर्फ ईंधन का होता है। पेलोड (यानी सैटेलाइट या इंसान) का वजन तो रॉकेट के कुल वजन का बमुश्किल 2 से 4 प्रतिशत ही होता है।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। अपोलो मिशन में जिस “Saturn V रॉकेट” ने इंसानों को चाँद पर पहुँचाया था, उसका कुल वजन लगभग 29 लाख किलो था। इसमें से 20 लाख किलो से ज्यादा सिर्फ ईंधन (केरोसिन और लिक्विड ऑक्सीजन) था। इसके इलावा बाकि लगभग 9 लाख किलो सारे सामान का वजन (धातु, प्लास्टिक, रबर इत्यादि) । लगभग लॉन्च होने के बाद शुरुआती कुछ ही मिनटों में यह रॉकेट हज़ारों लीटर ईंधन हर सेकंड पी जाता था।
अंतरिक्ष यात्रा में एक बहुत बड़ी समस्या होती है— “ईंधन का वजन उठाने के लिए और ज्यादा ईंधन चाहिए” इसीलिए रॉकेट को स्टेजेस या हिस्सों में बनाया जाता है। जैसे ही पहले हिस्से का ईंधन खत्म होता है, वह हिस्सा कटकर समुद्र में गिर जाता है। इससे रॉकेट का वजन कम हो जाता है और बचे हुए ईंधन के साथ आगे बढ़ना आसान हो जाता है।
पृथ्वी से चाँद की कुल दूरी कितनी है?
पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी हमेशा एक समान नहीं रहती, क्योंकि चाँद पृथ्वी के चारों ओर एकदम गोल चक्कर नहीं लगाता, बल्कि उसका रास्ता थोड़ा अंडाकार है।
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स्थिति |
दूरी (किलोमीटर में) |
विवरण |
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औसत दूरी |
लगभग 384,400 किमी |
यह वह दूरी है जो आमतौर पर किताबों और वैज्ञानिक गणनाओं में इस्तेमाल होती है। |
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सबसे नज़दीक |
लगभग 362,600 किमी |
जब चाँद पृथ्वी के सबसे पास होता है। |
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सबसे दूर |
लगभग 405,400 किमी |
जब चाँद पृथ्वी से सबसे अधिक दूरी पर होता है। |
ओजोन परत की दूरी कितनी है?
ओजोन परत कोई लोहे या कंक्रीट की दीवार नहीं है, बल्कि यह गैस (Ozone - O3) की एक अदृश्य चादर है जो हमें सूरज की खतरनाक पराबैंगनी किरणों से बचाती है।
शुरुआत और अंत - ओजोन परत पृथ्वी की सतह से लगभग 15 किलोमीटर की ऊंचाई से शुरू होती है और करीब 35 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैली हुई है। वायुमंडल की यह परत हमारे वायुमंडल के समताप मंडल का हिस्सा है।
ओजोन परत से गुजरते समय रॉकेट का कितना प्रतिशत ईंधन खर्च होता है?
कई लोगों को लगता है कि ओजोन परत को पार करने में रॉकेट को बहुत मशक्कत करनी पड़ती होगी, लेकिन भौतिक विज्ञान के नज़रिए से ऐसा नहीं है।
सबसे ज़्यादा ईंधन कहाँ जलता है?
रॉकेट का सबसे ज़्यादा (लगभग 70% से 80%) ईंधन लॉन्च पैड से उठने और शुरुआती 15 किलोमीटर क्षोभ मंडल को पार करने में खर्च हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ज़मीन के पास हवा बहुत घनी होती है और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण सबसे ज़्यादा ताकत से रॉकेट को नीचे खींच रहा होता है। इसे “Max-Q” (अधिकतम वायुगतिकीय दबाव) का क्षेत्र भी कहते हैं।
ओजोन परत में ईंधन की खपत का गणित
जब रॉकेट लगभग 15 किलोमीटर की ऊंचाई (जहाँ से ओजोन परत शुरू होती है) पर पहुँचता है, तब तक वह ध्वनि की गति को पार कर चुका होता है और हज़ारों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहा होता है। लगभग 15 किमी से 35 किमी (यानी लगभग 20 किलोमीटर की मोटाई वाली ओजोन परत) को पार करने में एक आधुनिक रॉकेट को महज़ 20 से 30 सेकंड का समय लगता है।
क्योंकि रॉकेट इस परत से बहुत तेज़ी से गुज़रता है और यहाँ हवा का दबाव भी काफी कम हो जाता है, इसलिए इस लगभग 20 किलोमीटर के हिस्से को पार करने में रॉकेट के कुल ईंधन का केवल लगभग 2% से 5% हिस्सा ही इस्तेमाल होता है (यह प्रतिशत रॉकेट के आकार और पेलोड पर निर्भर करता है)। रॉकेट के लिए ओजोन परत कोई रुकावट नहीं है। यह बस रास्ते में आने वाला एक छोटा सा माइलस्टोन है जिसे रॉकेट अपनी भयंकर गति के कारण पलक झपकते ही पार कर लेता है। रॉकेट की असली लड़ाई ओजोन परत से नहीं, बल्कि शुरुआत के घने वायुमंडल और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से होती है।
गति और समय का गणित कैसे तय होता है?
अंतरिक्ष में कोई सड़क या हाईवे नहीं होते। वहाँ सब कुछ गणित और ऑर्बिटल मैकेनिक्स (रॉकेट की गति का अध्ययन) पर निर्भर करता है। चाँद और धरती दोनों ही ब्रह्मांड में लगातार घूम रहे हैं। धरती अपनी धुरी पर घूम रही है और चाँद धरती के चक्कर लगा रहा है। इसलिए रॉकेट को सीधे चाँद की तरफ निशाना लगाकर नहीं छोड़ा जाता। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी उड़ते हुए पक्षी को पत्थर मारना चाहते हैं—आप पत्थर वहाँ नहीं मारते जहाँ पक्षी अभी है, बल्कि वहाँ मारते हैं जहाँ पत्थर के पहुँचने तक पक्षी होगा।
वैज्ञानिक सुपरकंप्यूटर की मदद से करोड़ों गणितीय गणनाएं करते हैं। वे तय करते हैं कि रॉकेट को किस सेकंड पर छोड़ा जाए ताकि जब रॉकेट चाँद की कक्षा तक पहुँचे, ठीक उसी समय चाँद भी घूमते हुए उस जगह पर आ जाए। गति को बढ़ाने के लिए अक्सर रॉकेट पृथ्वी के चारों ओर गोल-गोल घूमते हैं और फिर एक सही समय पर इंजन को पूरी ताकत से चालू करके चाँद की तरफ का रास्ता पकड़ते हैं (इसे Trans-Lunar Injection कहते हैं)। इस पूरे सफर में रॉकेट की गति अंतरिक्ष के खालीपन की वजह से बिना किसी रुकावट के बनी रहती है।
चाँद तक पहुँचना एक बात है, लेकिन उसकी सतह पर सही-सलामत उतरना (Soft Landing) सबसे मुश्किल काम है। चाँद पर हवा नहीं है, इसलिए वहाँ पैराशूट काम नहीं करते।
जब लैंडर चाँद के करीब पहुँचता है, तो वह बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ रहा होता है। इसे धीमा करने के लिए लैंडर को उल्टा कर दिया जाता है और उसके थ्रस्टर्स (छोटे रॉकेट इंजन) को धरती की तरफ नहीं, बल्कि चाँद की सतह की तरफ फायर किया जाता है इससे लैंडर की गति कम होने लगती है।
एक खास जगह पर उतरने के लिए लैंडर में लेज़र, रडार और हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरे लगे होते हैं। ये सेंसर लगातार सतह की तस्वीरें खींचते हैं और कंप्यूटर को बताते हैं कि नीचे कोई बड़ा गड्ढा या नुकीला पत्थर तो नहीं है। जैसे-जैसे लैंडर सतह के करीब आता है, वह अपने इंजनों की ताकत को कम-ज्यादा करके खुद को बिल्कुल सटीक जगह पर ले जाता है। भारत के चंद्रयान-3 ने भी चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर इसी शानदार तकनीक का इस्तेमाल करके एक बिल्कुल सटीक और सुरक्षित लैंडिंग की थी।
चाँद पर काम खत्म करने के बाद वापस लौटना लॉन्चिंग से थोड़ा आसान होता है। क्यों? क्योंकि चाँद का गुरुत्वाकर्षण धरती के मुकाबले 6 गुना कम है और वहाँ कोई हवा का दबाव नहीं है। इसलिए वहाँ से उड़ने के लिए बहुत बड़े रॉकेट या बहुत ज्यादा ईंधन की ज़रूरत नहीं होती। लैंडर का ऊपरी हिस्सा नीचे वाले हिस्से को वहीं छोड़कर एक छोटे से इंजन की मदद से उड़ जाता है और चाँद की कक्षा में चक्कर लगा रहे मुख्य यान से जुड़ जाता है। इसके बाद यान पृथ्वी की तरफ मुड़ता है और अपने इंजन को स्टार्ट करता है कुछ समय बाद धरती का गुरुत्वाकर्षण खुद-ब-खुद यान को अपनी तरफ तेज़ी से खींचने लगता है।
जब अंतरिक्ष यान लगभग 40,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से धरती के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो हवा के घर्षण के कारण यान के बाहर का तापमान लगभग 2500 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा हो जाता है। यह इतनी भयंकर गर्मी है जो लोहे को भी पिघला दे, इससे बचने के लिए यान के निचले हिस्से पर एक खास हीट शील्ड लगाई जाती है जो जलती है लेकिन अंदर के यात्रियों या मशीनों को ठंडा रखती है।
जैसे ही यान वायुमंडल की मोटी परत में आता है, हवा के दबाव से उसकी गति अपने आप बहुत कम हो जाती है। अंत में, धरती से कुछ किलोमीटर की ऊंचाई पर बड़े-बड़े पैराशूट खुल जाते हैं, जो यान को धीरे-धीरे समुद्र के पानी में या ज़मीन पर सुरक्षित उतार देते हैं।
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अंतरिक्ष की यह यात्रा मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। एक रॉकेट का उड़ना, चाँद पर पहुँचना और वापस आना केवल मशीनों का खेल नहीं है, बल्कि यह भौतिकी, सटीक समय और वर्षों की मेहनत का एक ऐसा संगम है जो हर बार हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि इंसानी दिमाग के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।

