Dainik Radio logoदैनिक रेडियो
डिजिटल पेरेंट्स - परफेक्ट नहीं, प्रेजेंट बनें
डिजिटल पेरेंट्स - परफेक्ट नहीं, प्रेजेंट बनें
डिजिटल पेरेंट्स - परफेक्ट नहीं, प्रेजेंट बनें
डिजिटल पेरेंट्स - परफेक्ट नहीं, प्रेजेंट बनें

क्या अब सस्ते होंगे LED बल्ब? कैलिकट यूनिवर्सिटी की इस नई तकनीक ने बदली नैनोसाइंस की परिभाषा। पूरी जानकारी यहाँ से देखिये

क्या अब सस्ते होंगे LED बल्ब? कैलिकट यूनिवर्सिटी की इस नई तकनीक ने बदली नैनोसाइंस की परिभाषा। पूरी जानकारी यहाँ से देखिये
image source: AI
S
Sandeep Vidyarthi25 जून 2026

नमस्ते! मैं बात कर रहा हूँ दैनिक रेडियो से, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तकनीक हमारे अस्तित्व का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हम किसी किसी रूप में लाइट एमिटिंग डायोड (LED) से घिरे रहते हैं। चाहे वह आपके स्मार्टफोन की स्क्रीन हो, घर की स्मार्ट टीवी, या फिर सड़कों पर लगी लाइटें। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस रोशनी में हम रहते हैं, उसे और अधिक सस्ता, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? भारत के केरल राज्य में स्थित कैलिकट विश्वविद्यालय (University of Calicut) के शोधकर्ताओं ने इस दिशा में एक ऐसी कामयाबी हासिल की है, जिसने केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

कैलिकट विश्वविद्यालय के नैनोसाइंस और प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने सोने और तांबे (Gold-Copper alloy) के मेल से एक ऐसा नैनोक्लस्टर आधारित उपकरण तैयार किया है, जो अगली पीढ़ी की एलईडी तकनीक की नींव रख सकता है। यह शोध केवल विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि आम आदमी की जेब और पर्यावरण के लिए भी एक वरदान साबित हो सकता है। आइए, इस लेख में विस्तार से समझते हैं कि यह तकनीक क्या है और यह हमारे भविष्य को कैसे रोशन करेगी।

नैनोक्लस्टर: विज्ञान की सूक्ष्म दुनिया का छोटा पैकेट, बड़ा धमाका

अक्सर जब हम नैनो शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में बहुत छोटी चीज़ों का ख्याल आता है। लेकिन नैनोक्लस्टर इससे कहीं अधिक हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें नग्न आंखों से देखना नामुमकिन है, लेकिन इनकी ताकत असाधारण होती है। कैलिकट विश्वविद्यालय की स्मार्ट मटेरियल्स लैब में सहायक प्रोफेसर .एस. शिबु और उनके होनहार पीएचडी छात्र रिवाल जोस ने इन्हीं सूक्ष्म कणों के साथ जादू किया है।

इन शोधकर्ताओं ने सोने और तांबे के मिश्र धातु का उपयोग करके नैनोक्लस्टर विकसित किए हैं। इन नैनोक्लस्टर्स में फोटोफिजिकल गुण होते हैं, जिसका सरल भाषा में अर्थ है कि ये प्रकाश के साथ बहुत ही बेहतरीन तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। इनमें प्रकाश उत्सर्जन की क्षमता बहुत मजबूत होती है और ये लंबे समय तक अपनी चमक और स्थिरता बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये नैनोक्लस्टर केवल टिकाऊ हैं, बल्कि थर्मल स्टेबिलिटी (गर्मी सहने की क्षमता) के मामले में भी लाजवाब हैं। यही कारण है कि इन्हें भविष्य की डिस्प्ले तकनीक और टिकाऊ रोशनी के लिए सबसे उपयुक्त माना जा रहा है।

तकनीक की खासियत: शुद्ध लाल रोशनी और बेमिसाल दक्षता

एलईडी तकनीक में सबसे बड़ी चुनौती शुद्धता और दक्षता (Efficiency) की होती है। इस नए शोध में विकसित की गई एलईडी शुद्ध लाल प्रकाश (Pure Red Light) उत्सर्जित करती है। अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है? दरअसल, डिस्प्ले तकनीक में रंगों की शुद्धता ही तस्वीर की गुणवत्ता तय करती है।

इस उपकरण की बाह्य क्वांटम दक्षता (External Quantum Efficiency - EQE) 12.6% मापी गई है। सुनने में यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन प्रोफेसर .एस. शिबु बताते हैं कि "समाधान-प्रसंस्कृत (Solution-processed) और गैर-डोप्ड (Non-doped) एलईडी की श्रेणी में यह अब तक के उच्चतम प्रदर्शनों में से एक है।" इसका सीधा मतलब यह है कि इस एलईडी को बनाने की प्रक्रिया बहुत सरल है और इसमें किसी बाहरी अशुद्धि या डोपिंग की जरूरत नहीं पड़ती, फिर भी यह बहुत ही शानदार तरीके से बिजली को रोशनी में बदल देती है।

वैश्विक सहयोग: जब दुनिया के दिग्गज साथ आए

विज्ञान कभी भी अकेले कमरे में रहकर सफल नहीं होता; यह सामूहिक प्रयास का परिणाम होता है। कैलिकट विश्वविद्यालय की इस सफलता के पीछे एक मजबूत वैश्विक नेटवर्क है। इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने में भारत के गौरव भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc, बेंगलुरु) और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT, मद्रास) का तकनीकी सहयोग मिला।

सिर्फ इतना ही नहीं, फिनलैंड की टैम्परे विश्वविद्यालय और जापान की होक्काइडो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भी इस शोध में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। जब इतने देशों के तेज दिमाग एक साथ मिलते हैं, तभी ऐसी क्रांतिकारी खोज होती है। इस शोध के निष्कर्ष दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में से एक एडवांस्ड मटेरियल्स (Advanced Materials) में प्रकाशित हुए हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस जर्नल का इम्पैक्ट फैक्टर 27.4 है, जो इसकी गुणवत्ता और महत्व को दर्शाता है। यह कैलिकट विश्वविद्यालय के लिए गर्व का क्षण है क्योंकि यह इस उच्च श्रेणी की पत्रिका में उनका पहला प्रकाशन है।

सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल: आपकी जेब और प्रकृति का ख्याल

वर्तमान में हम जो एलईडी उपयोग करते हैं, उनके निर्माण की प्रक्रिया काफी जटिल और खर्चीली होती है। साथ ही, उनमें उपयोग होने वाले कुछ तत्व पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकते हैं। लेकिन कैलिकट विश्वविद्यालय द्वारा विकसित यह नैनोक्लस्टर तकनीक पूरी तरह से खेल बदल सकती है।

किफायती निर्माण: इस तकनीक में 'सॉल्यूशन प्रोसेसिंग' का उपयोग किया जाता है, जो निर्माण लागत को काफी हद तक कम कर देता है। भविष्य में जब यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर आएगी, तो एलईडी बल्ब और डिस्प्ले सस्ते हो सकते हैं।

ऊर्जा की बचत: उच्च क्वांटम दक्षता का अर्थ है कम बिजली की खपत और अधिक रोशनी। यह सीधे तौर पर आपके बिजली बिल को कम करने और ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने में मदद करेगा।

इको-फ्रेंडली: शोधकर्ताओं ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि उपयोग की जाने वाली सामग्री पर्यावरण के अनुकूल हो, ताकि कचरे के निपटान के समय प्रकृति को नुकसान पहुंचे।

सरकारी समर्थन की बड़ी भूमिका

इतने बड़े स्तर के शोध के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने अपने 'विश्वविद्यालय अनुसंधान और वैज्ञानिक उत्कृष्टता संवर्धन' कार्यक्रम के माध्यम से इस प्रोजेक्ट को मुख्य रूप से वित्तपोषित किया। इसके अलावा, एसईआरबी (SERB) स्टार्टअप अनुदान, केरल सरकार की विज्ञान परिषद और जापान की प्रसिद्ध संस्था जेएसपीएस (JSPS) ने भी इसमें आर्थिक मदद की। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सही प्रतिभा को सही संसाधनों का साथ मिले, तो भारतीय शोधकर्ता दुनिया को राह दिखा सकते हैं।

भविष्य की संभावनाएं: सिर्फ बल्ब ही नहीं, और भी बहुत कुछ

यह शोध केवल घर के बल्बों तक सीमित नहीं रहने वाला है। इसके भविष्य के अनुप्रयोगों की सूची काफी लंबी है:

बायोमेडिकल इमेजिंग: इन नैनोक्लस्टर्स का उपयोग शरीर के अंदर की बीमारियों का पता लगाने (Imaging) के लिए किया जा सकता है। इनकी स्थिरता और चमक डॉक्टरों को शरीर के सूक्ष्म अंगों की स्पष्ट तस्वीरें देखने में मदद करेगी। अल्ट्रा-एचडी डिस्प्ले, आने वाले समय में आपके फोन और टीवी की स्क्रीन और भी जीवंत और ऊर्जा कुशल होगी। कम लागत और उच्च स्थिरता के कारण यह तकनीक ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती रोशनी पहुंचाने के काम आएगी। 

अंत में जरुरी बात - छोटे कणों से बड़े बदलाव

कैलिकट विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की यह उपलब्धि नैनोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है। प्रोफेसर .एस. शिबु और रिवाल जोस ने साबित कर दिया है कि "छोटे कण वाकई बड़े बदलाव ला सकते हैं।" यह शोध केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर स्थापित करता है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सपने को भी मजबूती देता है। नैनोसाइंस की इस दुनिया में अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है, लेकिन कैलिकट से उठी यह सुनहरी चमक (सोने और तांबे की चमक) निश्चित रूप से भविष्य को अधिक उज्ज्वल और टिकाऊ बनाएगी। यह देखना रोमांचक होगा कि यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर कब हमारे घरों का हिस्सा बनती है।


ये भी जरूर पढ़ें!

फिबोनाची अनुक्रम; प्रकृति का रहस्यमयी गणित, फिबोनाची अनुक्रम और हमारा आधुनिक जीवन