उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) एक साइलेंट किलर है तनाव, नींद और नमक क्यों उच्च रक्तचाप अब केवल एक संख्या नहीं है पूरी जानकारी यहाँ से देखिये

नमस्ते! एक डॉक्टर के रूप में, मेरी ओपीडी में हर दिन कई ऐसे मरीज आते हैं जो किसी अन्य सामान्य सी बीमारी, जैसे हल्का बुखार, बदन दर्द या फिर रूटीन चेकअप के लिए क्लिनिक में कदम रखते हैं। जब नर्स उनका ब्लड प्रेशर नापती है और मशीन की स्क्रीन पर 160/100 या 170/110 जैसे खतरनाक आँकड़े उभरते हैं, तो मैं मरीज से पूछता हूँ, "क्या आपको सिरदर्द, चक्कर या कोई और परेशानी महसूस हो रही है?" उनका जवाब अक्सर एक ही होता है— बिल्कुल नहीं डॉक्टर साहब, मैं तो पूरी तरह से फिट महसूस कर रहा हूँ। और यही हाई ब्लड प्रेशर या उच्च रक्तचाप का सबसे डरावना पहलू है। लोग सोचते हैं कि अगर वे बीमार नहीं दिख रहे हैं या उन्हें कोई दर्द नहीं हो रहा है, तो वे पूरी तरह स्वस्थ हैं। लेकिन असलियत यह है कि आपके शरीर के भीतर एक खामोश तूफान चल रहा होता है। इसी वजह से चिकित्सा विज्ञान में हाई ब्लड प्रेशर को साइलेंट किलर या खामोश हत्यारा कहा जाता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई सायरन नहीं बजता, कोई अलार्म नहीं होता, लेकिन जब तक आपको इसका पता चलता है, तब तक यह शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को भीतर ही भीतर खोखला कर चुका होता है।
इस विषय को समझाने के लिए मैं अक्सर बेंगलुरु के नारायण हेल्थ सिटी में कार्डियक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी के वरिष्ठ सलाहकार, डॉ. दीपक पद्मनाभन की एक बहुत ही सटीक बात का जिक्र करता हूँ। डॉ. पद्मनाभन बहुत ही सरल शब्दों में चेतावनी देते हुए कहते हैं, यह एक धीमी रिसाव (slow leak) की तरह है; आप इसे तुरंत महसूस नहीं करते, लेकिन यह स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर या मेमोरी लॉस का कारण बन सकता है। उनकी यह बात इस बीमारी की पूरी तस्वीर को साफ कर देती है। जरा सोचिए, अगर आपके घर की दीवार के अंदर पानी के पाइप से एक बहुत ही धीमा रिसाव हो रहा हो। आपको बाहर से कोई पानी गिरता हुआ नहीं दिखेगा, कोई आवाज नहीं आएगी। आप कई महीनों तक आराम से उसी घर में रहते रहेंगे। लेकिन वह धीमा रिसाव धीरे-धीरे दीवार की ईंटों को, उसके प्लास्टर को और घर की नींव को कमजोर कर रहा होता है। एक दिन अचानक, बिना किसी बड़ी चेतावनी के, वह दीवार ढह जाती है। हाई ब्लड प्रेशर हमारे शरीर में बिल्कुल इसी तरह काम करता है। हमारी रक्त वाहिकाएं (blood vessels) उन पाइपों की तरह हैं, और जब उनमें खून का दबाव सामान्य से बहुत अधिक हो जाता है, तो यह दबाव धीरे-धीरे शरीर के हर उस अंग को नुकसान पहुँचाता है जहाँ खून पहुँच रहा है। और इसका अंतिम परिणाम कोई छोटी-मोटी बीमारी नहीं, बल्कि जानलेवा स्थितियां होती हैं।
आइए सबसे पहले यह समझते हैं कि यह धीमा रिसाव आपके मस्तिष्क (Brain) के साथ क्या करता है। जब हम हाई ब्लड प्रेशर की बात करते हैं, तो लोग तुरंत हार्ट अटैक के बारे में सोचते हैं, लेकिन यह आपके दिमाग के लिए भी उतना ही बड़ा खतरा है। लगातार उच्च रक्तचाप के कारण मस्तिष्क की नाजुक और पतली रक्त वाहिकाएं कठोर और कमजोर होने लगती हैं। एक स्थिति ऐसी आती है जब दबाव इतना बढ़ जाता है कि कोई नस फट सकती है, जिससे ब्रेन हेमरेज या स्ट्रोक हो सकता है। स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसमें इंसान पल भर में लकवाग्रस्त (paralyzed) हो सकता है, उसकी बोलने की क्षमता जा सकती है, या उसकी जान भी जा सकती है। लेकिन इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात वह है जो बहुत धीमी गति से होती है— डिमेंशिया (Dementia) या मेमोरी लॉस (याददाश्त का जाना)। जब दिमाग की छोटी-छोटी नसों को नुकसान पहुँचता है, तो मस्तिष्क के उन हिस्सों को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता जो हमारी याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और फैसले लेने की ताकत को नियंत्रित करते हैं। इसे 'वैस्कुलर डिमेंशिया' कहा जाता है। अक्सर जब घर के बुजुर्ग चीजें भूलने लगते हैं, उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, तो हम सोचते हैं कि यह तो बुढ़ापे का असर है। लेकिन कई मामलों में, यह बुढ़ापा नहीं होता, बल्कि सालों तक अनियंत्रित रहा वह हाई ब्लड प्रेशर होता है जिसने उनके दिमाग को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाया है।
इसके बाद बात करते हैं उस अंग की जो बिना रुके धड़कता है— आपका हृदय (Heart)। हमारा दिल एक पंप की तरह है जिसका काम पूरे शरीर में खून को धकेलना है। अब कल्पना कीजिए कि एक पंप को ऐसे पाइप में पानी धकेलना है जो आगे से बहुत तंग हो गया है या जहाँ बहुत ज्यादा रुकावट है। पंप को सामान्य से बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। बिल्कुल यही हमारे दिल के साथ होता है। जब ब्लड प्रेशर हाई होता है, तो दिल को खून पंप करने के लिए जरूरत से ज्यादा जोर लगाना पड़ता है। इस लगातार अतिरिक्त मेहनत के कारण दिल की मांसपेशियां मोटी और सख्त होने लगती हैं (जिसे Left Ventricular Hypertrophy कहते हैं)। शुरू में तो दिल इस बोझ को सह लेता है, लेकिन कुछ सालों बाद वह थकने लगता है। वह कमजोर हो जाता है और शरीर की जरूरत के हिसाब से खून पंप नहीं कर पाता। इस स्थिति को हार्ट फेल्योर कहा जाता है। मरीज को थोड़ा सा चलने पर भी सांस फूलने लगती है, पैरों में सूजन आ जाती है और उसे रात को सोने में भी तकलीफ होती है। इसके अलावा, हाई ब्लड प्रेशर के कारण नसों में कोलेस्ट्रॉल और फैट जमने की प्रक्रिया भी तेज हो जाती है, जिससे नसों में ब्लॉकेज बन जाते हैं और अंततः हार्ट अटैक का रूप ले लेते हैं।
गुर्दे यानी किडनी पर इसके असर की बात करना भी उतना ही जरूरी है। हमारी किडनियां शरीर की मुख्य फिल्टरिंग मशीन हैं। इनमें लाखों छोटे-छोटे छनने (filters) होते हैं जिन्हें नेफ्रॉन (nephrons) कहा जाता है। इन नेफ्रॉन्स में बहुत ही बारीक और नाजुक रक्त वाहिकाओं का जाल बिछा होता है। जब इन नसों में हाई ब्लड प्रेशर का खून तेज धार और भारी दबाव के साथ बहता है, तो ये छलनियाँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। समय के साथ, किडनियां अपना काम करना बंद करने लगती हैं और खून से हानिकारक तत्वों और अतिरिक्त पानी को बाहर नहीं निकाल पातीं। इसे क्रॉनिक किडनी डिजीज या किडनी फेल्योर कहा जाता है। विडंबना यह है कि किडनी खराब होने के भी शुरुआती दौर में कोई लक्षण नहीं दिखते। जब तक मरीज को उल्टियां आना, पेशाब कम होना या शरीर में सूजन जैसे लक्षण महसूस होते हैं, तब तक किडनियां 70 से 80 प्रतिशत तक डैमेज हो चुकी होती हैं और मरीज को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ जाती है। यह सब उसी खामोश हत्यारे का किया धरा होता है जिसे हमने सालों तक नज़रअंदाज़ किया था।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर हमारे शरीर के इस सिस्टम में यह हाई प्रेशर बन क्यों रहा है? एक डॉक्टर के तौर पर मैं अक्सर देखता हूँ कि इसका सबसे बड़ा कारण हमारी आधुनिक जीवनशैली है। आज से कुछ दशक पहले हाई बीपी को उम्रदराज लोगों की बीमारी माना जाता था। लेकिन आज मेरी ओपीडी में 28, 30 और 35 साल के युवा हाई बीपी की दवाइयों के पर्चे लेकर बैठे होते हैं। हमारी भागदौड़ भरी जिंदगी, ऑफिस का बेतहाशा तनाव, सोने के अनियमित घंटे, और सबसे बड़ी बात— हमारा खानपान, इसके मुख्य अपराधी हैं। हम जितना नमक (सोडियम) खाते हैं, शरीर में पानी उतना ही रुकता है, और खून की नलियों में दबाव उतना ही बढ़ जाता है। लोग सोचते हैं कि मैं तो खाने में ऊपर से नमक नहीं डालता, लेकिन पैकेज्ड फूड, नमकीन, बिस्कुट, रेस्तरां के खाने, और यहाँ तक कि ब्रेड में भी इतना छिपा हुआ सोडियम होता है जो हमारे शरीर की जरूरत से कई गुना ज्यादा है। इसके साथ ही शारीरिक मेहनत का कम होना, घंटों कंप्यूटर के सामने बैठे रहना, वजन बढ़ना, शराब और सिगरेट का अत्यधिक सेवन— ये सभी हाई ब्लड प्रेशर के लिए एकदम सही जमीन तैयार करते हैं।
लेकिन, इस पूरे गंभीर परिदृश्य में एक बहुत ही सकारात्मक और उम्मीद भरी बात भी है। और वह यह है कि हाई ब्लड प्रेशर भले ही एक खतरनाक बीमारी है, लेकिन यह पूरी तरह से नियंत्रण में रखी जा सकने वाली स्थिति है। आप इस साइलेंट किलर को अपनी जान लेने से रोक सकते हैं। इसके लिए सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम है— जागरूकता और नियमित जांच। जब इसके कोई लक्षण ही नहीं हैं, तो इससे बचने का एकमात्र तरीका है कि आप इसे खुद ढूंढें। अगर आपकी उम्र 30 वर्ष से अधिक है, तो आपको कम से कम साल में एक बार अपना ब्लड प्रेशर जरूर चेक कराना चाहिए। आज के समय में तो डिजिटल बीपी मशीनें हर मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध हैं। आप इन्हें घर पर रख सकते हैं। अपना नंबर जानना बहुत जरूरी है। 120/80 mmHg को आदर्श माना जाता है। अगर आपका बीपी लगातार 130/80 या उससे ऊपर रहता है, तो आपको सचेत हो जाने की जरूरत है।
अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर डायग्नोस हो जाता है, तो घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि जीवनशैली में बदलाव करने का समय है। अपने आहार में ताजे फल, सब्जियां, और साबुत अनाज शामिल करें (इसे DASH डाइट कहा जाता है)। पैकेट बंद खाने और जंक फूड से दूरी बनाएं। दिन में कम से कम 30 से 40 मिनट पसीना बहाने वाला व्यायाम करें, जैसे तेज चलना, साइकिल चलाना या तैरना। वजन को नियंत्रण में रखें— केवल 4-5 किलो वजन कम करने से भी ब्लड प्रेशर में चमत्कारी गिरावट आ सकती है। तनाव को मैनेज करना सीखें; योग, ध्यान और 7-8 घंटे की गहरी नींद आपके शरीर के बढ़े हुए ब्लड प्रेशर को शांत करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।
और अंत में, मैं एक डॉक्टर के नाते सबसे महत्वपूर्ण सलाह देना चाहता हूँ जो अक्सर मरीज गलत करते हैं— दवाइयों का पूरा कोर्स। अक्सर मरीज कहते हैं, डॉक्टर साहब, मैंने एक महीने आपकी दी हुई गोली खाई, फिर मैंने मशीन में चेक किया तो बीपी नॉर्मल आ रहा था, इसलिए मैंने दवा बंद कर दी। मुझे उसकी आदत नहीं डालनी थी। यह हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी और जानलेवा गलती है। आपका बीपी इसलिए नॉर्मल आ रहा था क्योंकि वह दवा काम कर रही थी। जैसे ही आप दवा बंद करते हैं, वह खामोश हत्यारा फिर से सक्रिय हो जाता है और आपके अंगों को नुकसान पहुँचाने लगता है। हाई बीपी की दवाएं आपके चश्मे की तरह होती हैं; जब तक आप चश्मा पहनते हैं, आपको साफ दिखता है, उतार देते हैं तो फिर धुंधला हो जाता है। इसलिए, बिना अपने डॉक्टर से पूछे कभी भी बीपी की दवा बंद न करें, उसकी डोज़ कम न करें। ये गोलियां कोई लत नहीं हैं, ये आपकी ढाल हैं जो आपको स्ट्रोक, डिमेंशिया और हार्ट अटैक से बचा रही हैं।
अंत में जरुरी बात
अपना शरीर बहुत कीमती है। डॉ. दीपक पद्मनाभन की उस धीमे रिसाव वाली चेतावनी को हमेशा याद रखें। यह न सोचें कि आप बीमार महसूस नहीं कर रहे हैं तो आपको कुछ नहीं हो सकता। इस खामोश खतरे को खामोशी से अपना काम न करने दें। आज ही अपना ब्लड प्रेशर चेक करवाएं, अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाएं, और इस साइलेंट किलर को अपने घर, अपने शरीर और अपनी जिंदगी से कोसों दूर रखें। स्वस्थ रहें, खुश रहें और अपने दिल और दिमाग का ख्याल रखें!
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