हाँ, मैं मान लूँगा

हाँ, गलती हुई... तो मैं मान लूँगा।
गलती इंसान का स्वभाव है, ये हकीकत मैं जानता हूँ,
गिरकर फिर से सँभलने को ही, मैं ज़िंदगी मानता हूँ।
अगर सफर में मेरे कदमों से कभी कोई भूल हुई,
बिना किसी दलील के, अपनी हर चूक मान लूँगा।
हाँ, गलती हुई... तो मैं मान लूँगा।
तकरार से कुछ हासिल नहीं, बस वक़्त का नुकसान होता है,
उलझनों में फँसकर कहाँ, मंज़िलों का निर्माण होता है।
बेवजह की बहस से अगर, कोई अपना टूटता हो,
तो सच होकर भी, मैं खुद को गलत मान लूँगा।
हाँ, गलती नहीं हुई... तब भी मैं मान लूँगा।
क्या रखा है हर बार खुद को, सही साबित करने में?
क्या मिलेगा महज़ शब्दों के, तीखे बाणों से लड़ने में?
ज़िंदगी के इस बड़े फलक पर, झूठे अहम की जगह कहाँ,
तंग नज़रिए को छोड़कर, एक खुला आसमान मान लूँगा।
सुकून को बचाने के लिए... अपना नुकसान मान लूँगा।
ठहर जाना मेरी फितरत नहीं, मुझे तो चलते जाना है,
इन छोटी-छोटी रुकावटों से परे, एक नया मुकाम पाना है।
मुझे जीतनी है ज़िंदगी, कोई छोटी सी बाज़ी नहीं,
अगर झुकने से सफर सँवरे, तो वक़्त का फरमान मान लूँगा।
हाँ, आगे बढ़ने के लिए... तो मैं हार भी मान लूँगा।
सीखने की इस राह पर, ज़िंदगी रोज़ नए पाठ पढ़ाती है,
हर गिरती हुई ठोकर, सँभलने का एक नया हुनर सिखाती है।
ज़िद छोड़ दी है मैंने अब, बस अपनी मंज़िल से मुझे प्यार है,
हर नए तजुर्बे को, मैं ज़िंदगी का वरदान मान लूँगा।
मुस्कुराकर ज़माने के... हर इल्ज़ाम मान लूँगा।
जो झुकता है सही वक़्त पर, असल में वही सब कुछ पाता,
अकड़ कर खड़े रहने से, कोई दरिया पार नहीं कर पाता।
पैसा ज़रूरी है, ये बात मैं भी जानता हूँ,
मगर रिश्तों से बड़ा कोई ख़ज़ाना नहीं मानता हूँ।
इन अनमोल मोतियों की खातिर, अपना गुमान त्याग दूँगा।
गलती हुई तब भी मैं… मान लूँगा,
गलती नहीं हुई तब भी मैं… मान लूँगा,
आगे बढ़ने के लिए तो खुशी से मैं… हार भी मान लूँगा।
संदीप विद्यार्थी
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