हम सारे इक्कठे रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे की… पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते है।

इंसान
हम सारे… इक्कठे रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे की… पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते हैं।
प्यार में नहीं… जरूरत में इक्कठे रहते हैं, चलो कोई ना… इक्कठे तो रहते हैं।
एक बात बताऊँ… हम सिर्फ दिखावे के लिए इक्कठे रहते हैं।
जब बात हो पैसे, जमीन या खुद के स्वार्थ की… तब हम बिल्कुल… अलग रहते हैं।
वैसे हम सारे… इक्कठे रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे की… पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते हैं।
आज कल हँसी-मजाक, चुटकले, कहानी-किसे, सार्थक बात,
सुख-दुःख साँझा करने की सिर्फ बातें करते रहते हैं।
वैसे हम एक-दूसरे की पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते हैं।
एक बात और बताऊँ… एक-दूसरे पर ताने मारना, गाली-गलौज,
खुद को ईमानदार और सामने वाले को बेईमान,
खुद को ऊँचा और सामने वाले को नीचा,
खुद को सही और सामने वाले को गलत,
खुद को ज्ञानी और सामने वाले को मुर्ख बताते रहते हैं।
वैसे हम सारे… इक्कठे रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे की… पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते हैं।
हम ये भूल जाते हैं कि घर के छोटे बच्चे भी हमें ये सब करते हुए देखते रहते हैं,
उन्हें सही राह का ज्ञान देकर, खुद फरेब का नकाब ओढ़े रहते हैं।
सच कहूँ तो हम अपनों के बीच ही एक अनजानी सी जंग लड़ते रहते हैं,
रिश्तों की इस खोखली बुनियाद को, आदत समझ कर ढोते रहते हैं।
मुंह पर “मुबारक हो” कहकर, पीठ-पीछे औकात का हिसाब लगाते रहते हैं।
बस अपनी ही “मैं” में चूर, हम दिन-रात यही सब करते रहते हैं।
वैसे हम सारे… इक्कठे रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे की… पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते हैं।
एक सवाल है मेरा आपसे… क्या आपके आस-पास भी… ऐसे लोग रहते हैं। जो पीठ-पीछे बुराई करके खुश रहते हैं।
संदीप विद्यार्थी
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