विकसित देशों की तर्ज पर भारतीय स्कूली पाठ्यक्रम में सिविक सेंस क्यों है समय की सबसे बड़ी मांग?

क्या आपने कभी सड़क पर चलते हुए किसी महंगी लग्जरी कार का शीशा नीचे आते और उसमें से प्लास्टिक की खाली बोतल या चिप्स का पैकेट सड़क पर गिरते हुए देखा है? या फिर किसी पढ़े-लिखे सूट-बूट वाले व्यक्ति को सार्वजनिक दीवार पर थूकते हुए या ट्रैफिक सिग्नल तोड़ते हुए देखा है? यकीनन आपका जवाब “हां” होगा। यह दृश्य हमारे देश में बहुत आम है। जब हम ऐसी घटनाओं को देखते हैं, तो हमारे मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि इतनी महंगी शिक्षा और डिग्रियों का क्या फायदा, जब इंसान को समाज में रहने का बुनियादी सलीका ही नहीं पता? यहीं पर बात आती है सिविक सेंस यानी नागरिक भावना या सामाजिक जिम्मेदारी की। एक शिक्षक के तौर पर, जब मैं भारतीय शिक्षा प्रणाली की तुलना यूरोप और अन्य विकसित देशों के स्कूली पाठ्यक्रम से करता हूं, तो मुझे हमारे एजुकेशन सिस्टम में एक बहुत बड़ा खालीपन नजर आता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था अच्छे इंजीनियर, डॉक्टर और मैनेजर तो पैदा कर रही है, लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक तैयार करने में हम कहीं न कहीं पीछे छूट रहे हैं।
सिविक सेंस का सीधा सा मतलब है समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना। इसमें सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करना, साफ-सफाई रखना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना और एक सभ्य समाज के निर्माण में अपना योगदान देना शामिल है। दुर्भाग्य से, भारत में सिविक सेंस को अक्सर केवल कॉमन सेंस मान लिया जाता है, यह सोचकर कि बच्चे उम्र के साथ इसे अपने आप सीख जाएंगे। लेकिन मनोविज्ञान के अनुसार, मानवीय व्यवहार और सामाजिक मूल्य रातों-रात नहीं पनपते; इन्हें बचपन से ही बोना पड़ता है। यही कारण है कि आज भारत के स्कूली पाठ्यक्रम में सिविक सेंस को एक मुख्य और अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की सख्त जरूरत है।
जब हम यूरोप के देशों या जापान जैसे विकसित राष्ट्रों के शिक्षा मॉडल का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो हमें पता चलता है कि उनकी तरक्की का राज केवल उनकी तकनीक या जीडीपी नहीं है, बल्कि उनके नागरिकों का उच्च स्तरीय सिविक सेंस है। यूरोप के कई देशों में सिटिजनशिप एजुकेशन (Citizenship Education) यानी नागरिकता की शिक्षा स्कूली पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य और बेहद व्यावहारिक हिस्सा है। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम में नागरिकता की पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं है। वहां के छात्रों को स्थानीय कम्युनिटी प्रोजेक्ट्स में हिस्सा लेना होता है, लोकल काउंसिल्स की कार्यप्रणाली समझनी होती है और समाज की वास्तविक समस्याओं पर डिबेट करनी होती है। वहां यह नहीं रटाया जाता कि कानून क्या हैं, बल्कि यह सिखाया जाता है कि उन कानूनों का सम्मान क्यों जरूरी है।
यूरोप के स्कैंडिनेवियाई देशों, विशेषकर फिनलैंड, जिसका शिक्षा मॉडल पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, वहां की शिक्षा प्रणाली सहानुभूति और सामाजिक सहयोग पर टिकी है। वहां के स्कूलों में बच्चों को प्रतिस्पर्धा से पहले सहयोग सिखाया जाता है। फिनलैंड में 7 साल की उम्र तक बच्चों को औपचारिक पढ़ाई से दूर रखा जाता है; इस दौरान उन्हें केवल प्रकृति से जुड़ना, अपने साथियों के साथ व्यवहार करना और अपनी चीजों को व्यवस्थित रखना सिखाया जाता है। वहां के स्कूलों में सफाई कर्मचारी कम होते हैं क्योंकि बच्चे और शिक्षक मिलकर स्कूल परिसर को साफ रखते हैं। यही कारण है कि जब ये बच्चे बड़े होते हैं, तो वे सार्वजनिक पार्कों या सड़कों पर कचरा फेंकने की कल्पना भी नहीं कर सकते।
जापान का उदाहरण तो और भी अधिक प्रेरणादायक है। जापान के स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा जिसे वे दौतोकू (Doutoku) कहते हैं, सबसे अहम विषय है। जापानी स्कूलों में ओसोजी (Osoji) नाम की एक प्रथा है, जिसके तहत छात्र हर दिन अपनी कक्षाओं, टॉयलेट और स्कूल के मैदान की सफाई खुद करते हैं। उनका मानना है कि जो बच्चा बचपन से झाड़ू लगाना और टॉयलेट साफ करना सीख जाता है, वह जीवन में कभी श्रम का अपमान नहीं करता और सार्वजनिक संपत्तियों को अपनी संपत्ति समझकर उनकी देखभाल करता है। यही कारण है कि जब जापानी फुटबॉल फैंस फीफा वर्ल्ड कप के दौरान स्टेडियम में मैच खत्म होने के बाद वहां का कचरा साफ करते हैं, तो पूरी दुनिया हैरान रह जाती है। उनके लिए यह कोई पीआर स्टंट नहीं, बल्कि उनके बचपन का संस्कार है जो उनके स्कूली पाठ्यक्रम ने उन्हें दिया है।
अब हम अपनी भारतीय शिक्षा प्रणाली की ओर लौटते हैं। हमारे यहां भी नैतिक शिक्षा और नागरिक शास्त्र जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। लेकिन सच कहूं तो, इनका स्वरूप बेहद किताबी और उबाऊ है। भारतीय पाठ्यक्रम में नागरिक शास्त्र का मतलब अक्सर संविधान के अनुच्छेदों, मौलिक अधिकारों और सरकारी ढांचे को रटने तक सीमित रह जाता है। इसका एकमात्र उद्देश्य परीक्षा में अच्छे अंक लाना होता है। जैसे ही परीक्षा खत्म होती है, बच्चा उन सारी बातों को भूल जाता है। हमारे स्कूलों में मौलिक कर्तव्यों को ब्लैकबोर्ड पर लिखा तो जाता है, लेकिन उन्हें जीवन में उतारने की कोई व्यावहारिक ट्रेनिंग नहीं दी जाती। हमारे यहां एक बच्चा गणित के जटिल समीकरण हल कर सकता है, लेकिन अगर उससे कहा जाए कि कचरे को गीले और सूखे डस्टबिन में अलग-अलग डालो, तो उसे वह काम मुश्किल या अपने स्तर से नीचे का लगता है। यह हमारे शिक्षा मॉडल की सबसे बड़ी हार है।
अगर भारत को वास्तव में एक विकसित और विश्व गुरु राष्ट्र बनना है, तो हमें अपने स्कूली पाठ्यक्रम में मूल बदलाव करने होंगे। सिविक सेंस को एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवनशैली के रूप में पढ़ाना होगा। इसे लागू करने के लिए हमें यूरोपीय और जापानी मॉडल से सीख लेते हुए कुछ बेहद व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, सिविक सेंस की शिक्षा पूरी तरह से प्रोजेक्ट-बेस्ड होनी चाहिए। इसके लिए कोई लिखित परीक्षा नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय, बच्चों का मूल्यांकन उनके व्यावहारिक कार्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कल्पना कीजिए कि भारत के स्कूलों में हर सप्ताह सिविक सेंस पीरियड हो। इस दौरान बच्चों को स्थानीय ट्रैफिक पुलिस के साथ सड़क पर ले जाकर ट्रैफिक नियमों की महत्ता समझाई जाए। उन्हें बताया जाए कि एम्बुलेंस को रास्ता देना क्यों जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण को केवल किताबों में पढ़ाने के बजाय, हर छात्र को एक पौधा लगाकर उसे पांच साल तक बड़ा करने की जिम्मेदारी दी जाए। स्कूलों में वेस्ट मैनेजमेंट, रीसाइक्लिंग और ऊर्जा बचाने के व्यावहारिक तरीके सिखाए जाएं। बच्चों को अनाथालयों, वृद्धाश्रमों या सरकारी अस्पतालों में वालंटियर करने के लिए भेजा जाए, ताकि उनके अंदर समाज के वंचित वर्गों के प्रति सहानुभूति और करुणा पैदा हो सके।
इसके अलावा, सिविक सेंस का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल लिटरेसी और साइबर शिष्टाचार भी है। आज के समय में, जब बच्चे अपना ज्यादातर समय इंटरनेट पर बिता रहे हैं, उन्हें यह सिखाना बेहद जरूरी है कि सोशल मीडिया पर किस तरह का व्यवहार स्वीकार्य है, फेक न्यूज की पहचान कैसे करें और ऑनलाइन बुलीइंग से कैसे बचें। यूरोपीय देशों के पाठ्यक्रम में साइबर एथिक्स को बहुत पहले ही शामिल कर लिया गया है, और भारत को भी इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।
शिक्षाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि बच्चे उपदेशों से नहीं, बल्कि अवलोकन से सीखते हैं। इसलिए, सिविक सेंस को पाठ्यक्रम में शामिल करने के साथ-साथ शिक्षकों और माता-पिता को भी अपना व्यवहार सुधारना होगा। अगर एक शिक्षक क्लास में बच्चों को सफाई का महत्व बताता है, लेकिन खुद स्कूल के परिसर में रैपर फेंकता है, तो बच्चा वही सीखेगा जो उसने देखा। इसलिए, स्कूलों को समग्र रूप से एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना होगा जहां सिविक सेंस हवा में घुला हो।
आर्थिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए, तो एक मजबूत सिविक सेंस वाले समाज का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब नागरिक सार्वजनिक संपत्तियों (जैसे रेलवे, बसें, स्मारक) को नुकसान नहीं पहुंचाते, तो सरकार के करोड़ों रुपये उनके रखरखाव पर खर्च होने से बच जाते हैं। जब लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करते हैं, तो दुर्घटनाएं कम होती हैं और जाम से होने वाले समय और ईंधन की बर्बादी रुकती है। जब लोग खुले में कचरा नहीं फेंकते, तो बीमारियां कम फैलती हैं, जिससे देश के हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ कम होता है। स्वच्छ भारत अभियान जैसी सरकारी योजनाएं तब तक 100% सफल नहीं हो सकतीं, जब तक कि सफाई हर भारतीय के डीएनए और आदतों में शामिल न हो जाए; और इसकी शुरुआत स्कूल के क्लासरूम से ही हो सकती है।
अंत में जरुरी बात
भारत आज इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी और स्पेस टेक्नोलॉजी में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हम चांद पर पहुंच चुके हैं, हमारी सड़कें चौड़ी हो रही हैं और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। लेकिन अगर उन विश्वस्तरीय सड़कों पर चलने वाले नागरिकों में लेन ड्राइविंग का सेंस नहीं है, अगर हमारी बुलेट ट्रेन के अंदर पान की पीक नजर आती है, तो हम कभी भी विकसित राष्ट्र कहलाने के सच्चे हकदार नहीं बन पाएंगे। सच्ची प्रगति केवल कंक्रीट की इमारतों या जीडीपी के आंकड़ों में नहीं झलकती; यह देश के नागरिकों के व्यवहार और उनकी सामाजिक चेतना में झलकती है। यूरोप और जापान हमें यही सिखाते हैं कि महान राष्ट्र केवल सरकारों द्वारा नहीं बनाए जाते; वे जिम्मेदार, अनुशासित और सिविक सेंस से युक्त नागरिकों द्वारा गढ़े जाते हैं। इसलिए, भारत के भविष्य को सुरक्षित और संवारने के लिए, स्कूली पाठ्यक्रम में सिविक सेंस की व्यावहारिक शिक्षा को शामिल करना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी और अनिवार्य मांग है।
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