इंडिया वर्सेस भारत की बहस, सामाजिक वर्गीकरण - समाज के ताने-बाने की एक गहरी और प्रामाणिक पड़ताल

मैंने मानवीय व्यवहार और हमारे समाज की संरचना को बहुत करीब से देखा है। आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहा हूँ जो हम सबकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है, फिर भी हम इसके बारे में खुलकर बात करने से कतराते हैं। यह विषय है— सामाजिक वर्गीकरण यानी समाज का अलग-अलग हिस्सों, वर्गों या स्तरों में बंटा होना। सोच कर देखिए, जब आप पहली बार किसी अजनबी से मिलते हैं, तो आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? हम अनजाने में ही सामने वाले के कपड़े, उसके बात करने के लहज़े, उसकी गाड़ी, या उसके नाम के पीछे लगे सरनेम (उपनाम) से यह अंदाज़ा लगाने लगते हैं कि वह समाज के किस वर्ग से ताल्लुक रखता है। इंसान की फितरत ही कुछ ऐसी है कि वह चीज़ों को और लोगों को खांचों में बांटकर देखना पसंद करता है। समाजशास्त्र की भाषा में इसे सोशल स्ट्रैटिफिकेशन या सामाजिक वर्गीकरण कहा जाता है। यह कोई आज की बात नहीं है, बल्कि जब से मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है, तब से इंसानों ने खुद को किसी न किसी आधार पर बांट रखा है।
अगर हम भारत के संदर्भ में बात करें, तो हमारे यहाँ सामाजिक वर्गीकरण की जड़ें इतिहास में बहुत गहरी धंसी हुई हैं। जब भी भारतीय समाज में विभाजन की बात होती है, तो सबसे पहला विचार जाति व्यवस्था का आता है। प्राचीन काल में शुरू हुई वर्ण व्यवस्था मूल रूप से कर्म या व्यवसाय पर आधारित थी— जिसमें ब्राह्मण (शिक्षक और विद्वान), क्षत्रिय (योद्धा और शासक), वैश्य (व्यापारी) और शूद्र (सेवा करने वाले) शामिल थे। लेकिन समय के साथ, यह व्यवस्था कर्म के बजाय जन्म पर आधारित हो गई और इसने एक बहुत ही कठोर जाति व्यवस्था का रूप ले लिया। यह इतिहास का एक ऐसा कड़वा सच है जिसने सदियों तक समाज के एक बड़े हिस्से को शिक्षा, संपत्ति और सम्मान से वंचित रखा। आज़ादी के बाद, संविधान निर्माताओं, विशेषकर डॉ. बी.आर. अंबेडकर जी ने इस असमानता को दूर करने के लिए कड़े कानून बनाए और आरक्षण जैसी नीतियां लागू कीं। तथ्य यह बताते हैं कि कानूनी रूप से छुआछूत और भेदभाव अब एक बड़ा अपराध है और इन नीतियों से हाशिए पर खड़े वर्गों को मुख्यधारा में आने का मौका भी मिला है। लेकिन अगर हम व्यावहारिक धरातल पर देखें, तो क्या सच में जाति का प्रभाव खत्म हो गया है? राजनीति में टिकटों का बंटवारा जातियों के समीकरण देखकर होता है। हालांकि, शहरों में इसका स्वरूप थोड़ा बदला है और लोग अब साथ बैठकर खाते हैं, साथ काम करते हैं, लेकिन ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में आज भी जाति एक बहुत बड़ा सामाजिक वर्गीकरण का आधार बनी हुई है जो लोगों की सामाजिक स्थिति तय करती है।
जाति से थोड़ा आगे बढ़ें, तो आज के दौर में जो वर्गीकरण सबसे ज़्यादा हावी है, वह है आर्थिक वर्गीकरण यानी पैसों और संपत्ति के आधार पर समाज का बंटवारा। साल 1991 में जब भारत में उदारीकरण की शुरुआत हुई, तो हमारी अर्थव्यवस्था ने एक लंबी छलांग लगाई। इससे एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग पैदा हुआ। आज अगर आप देखें, तो भारतीय समाज मुख्य रूप से तीन आर्थिक वर्गों में बंटा हुआ नज़र आता है— उच्च वर्ग (अमीर), मध्यम वर्ग, और निम्न वर्ग (गरीब)। लेकिन यह इतना सीधा नहीं है। मध्यम वर्ग खुद कई हिस्सों में बंटा है— लोअर मिडिल क्लास, मिडिल क्लास, और अपर मिडिल क्लास। एक बहुत ही दिलचस्प और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कई वैश्विक आर्थिक रिपोर्ट्स (जैसे ऑक्सफैम की रिपोर्ट) बताती हैं कि भारत की कुल संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ ऊपर के 1% से 10% अमीर लोगों के पास है, जबकि आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। यह आर्थिक वर्गीकरण हमारी ज़िंदगी के हर फैसले को प्रभावित करता है। आप किस अस्पताल में अपना इलाज करवाएंगे, आपके बच्चे किस स्कूल में पढ़ेंगे, आप छुट्टियां मनाने कहाँ जाएंगे, यहाँ तक कि आप कैसा खाना खाएंगे— यह सब आपकी आर्थिक क्लास तय करती है। अपर मिडिल क्लास और अमीर लोग जहाँ प्राइवेट अस्पतालों और इंटरनेशनल स्कूलों का रुख करते हैं, वहीं निम्न वर्ग आज भी सरकारी सुविधाओं पर निर्भर है। यह पैसों का बंटवारा एक ऐसी अदृश्य दीवार है जिसे पार करना हर किसी का सपना तो है, लेकिन हकीकत में ऐसा कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है। एक गरीब इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी मेहनत करके सिर्फ मिडिल क्लास तक पहुँचने की जद्दोजहद में लगा रहता है, और मिडिल क्लास का इंसान ईएमआई के बोझ तले दबकर अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करता है।
आर्थिक और जातीय वर्गीकरण के अलावा, भारत में एक और बहुत बड़ा सामाजिक वर्गीकरण है जिसे हम भौगोलिक और सांस्कृतिक वर्गीकरण कह सकते हैं। आपने अक्सर इंडिया वर्सेस भारत की बहस सुनी होगी। यह सिर्फ एक राजनीतिक जुमला नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़ी सामाजिक सच्चाई है। इंडिया से मतलब उन बड़े महानगरों (जैसे मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे) से है, जहाँ गगनचुंबी इमारतें हैं, मल्टीनेशनल कंपनियां हैं, लोग फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और पश्चिमी जीवनशैली को अपना चुके हैं। दूसरी तरफ भारत है, जो हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में बसता है, जहाँ आज भी परंपराएं, खेती-बाड़ी, स्थानीय भाषाएं और देसी रहन-सहन ज़िंदा है। इन दोनों वर्गों की सोच, इनकी ज़रूरतें और इनकी आकांक्षाएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। मेट्रो शहरों में रहने वाले युवाओं की समस्या यह हो सकती है कि उन्हें वीकेंड पर कौन से कैफे जाना है या कौन सा नया आईफोन खरीदना है, जबकि गाँव या छोटे शहर के युवा की सबसे बड़ी चिंता एक पक्की सरकारी या प्राइवेट नौकरी पाना होती है ताकि वह अपने परिवार को आर्थिक सुरक्षा दे सके। जब गाँवों से लोग काम की तलाश में शहरों की तरफ पलायन करते हैं, तो उन्हें इस सांस्कृतिक वर्गीकरण का बहुत तीखा सामना करना पड़ता है। उन्हें उनके कपड़ों, उनके लहज़े और उनके रहन-सहन की वजह से कई बार गंवार या पिछड़ा मान लिया जाता है। यह शहरी बनाम ग्रामीण का वर्गीकरण हमारे समाज में एक गहरी मनोवैज्ञानिक खाई पैदा करता है, जहाँ शहरी व्यक्ति खुद को आधुनिक और श्रेष्ठ समझता है, जबकि ग्रामीण व्यक्ति अक्सर हीन भावना का शिकार हो जाता है या फिर शहरी चकाचौंध को संदेह की नज़र से देखता है।
अब बात करते हैं 21वीं सदी के कुछ बिल्कुल नए तरह के सामाजिक वर्गीकरण की, जिन्होंने आज के दौर में बहुत अहम जगह बना ली है। इनमें सबसे पहला है शिक्षा और भाषा का वर्गीकरण। आज के समय में भारत में अंग्रेजी भाषा सिर्फ एक संवाद का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह एक क्लास मार्कर बन गई है। आप चाहे कितने भी ज्ञानी क्यों न हों, लेकिन अगर आप एक कॉर्पोरेट मीटिंग में या किसी हाई-सोसाइटी पार्टी में फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं बोल पाते, तो आपको अनजाने में ही एक निचले दर्जे का मान लिया जाता है। इसी तरह, शिक्षा भी एक बड़ा विभाजन पैदा कर रही है। एक तरफ वो युवा हैं जो आईआईटी, आईआईएम या विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़कर आ रहे हैं, जिनका शुरुआती पैकेज ही लाखों में होता है। दूसरी तरफ वो करोड़ों युवा हैं जो टियर-2 या टियर-3 शहरों के साधारण कॉलेजों से डिग्रियां ले रहे हैं और रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहे हैं। यह एक नया “एलीट क्लास बनाम आम युवा” का वर्गीकरण है। इसके साथ ही, पिछले एक दशक में डिजिटल डिवाइड ने एक नया सामाजिक बंटवारा पैदा कर दिया है। कोरोना महामारी के दौरान हमने इसे बहुत करीब से देखा। जिन परिवारों के पास स्मार्टफोन, लैपटॉप और हाई-स्पीड इंटरनेट था, उनके बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन चलती रही और वो वर्क-फ्रॉम-होम करते रहे। लेकिन जो गरीब या ग्रामीण वर्ग इन तकनीकी सुविधाओं से दूर था, उनके लिए जीवन पूरी तरह रुक गया। आज समाज दो हिस्सों में बंटा है— एक वो जो डिजिटल दुनिया (सोशल मीडिया, ऑनलाइन पेमेंट, ई-कॉमर्स) का हिस्सा हैं, और दूसरे वो जो आज भी तकनीक से कोसों दूर हैं। तकनीक ने दुनिया को जोड़ा ज़रूर है, लेकिन इसने समाज में एक नई तरह की क्लास भी बना दी है।
मैं यह महसूस करता हूँ कि हम चाहे कितनी भी आधुनिकता की बात कर लें, इंसान की वर्गीकरण करने की यह आदत कभी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती। हमारा दिमाग चीजों को समझने के लिए उन्हें कैटेगरी में बांटता ही है। लेकिन समस्या वर्गीकरण में नहीं है, समस्या भेदभाव में है। जब हम किसी को खुद से अलग वर्ग का मानकर उसके साथ बुरा बर्ताव करते हैं, उसके अधिकारों को छीनते हैं या उसे आगे बढ़ने के समान अवसर नहीं देते, तब यह सामाजिक वर्गीकरण एक अभिशाप बन जाता है। एक स्वस्थ, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज वह नहीं है जहाँ कोई वर्ग न हो, बल्कि एक बेहतरीन समाज वह है जहाँ हर इंसान को एक वर्ग से दूसरे वर्ग में जाने की पूरी आज़ादी और अवसर मिले। एक गरीब का बच्चा अपनी मेहनत से बड़ा उद्योगपति बन सके, एक गाँव का युवा देश का नेतृत्व कर सके और किसी की भी पहचान उसकी जन्म की जाति या भाषा से नहीं, बल्कि उसकी काबलियत से तय हो। हमें ज़रूरत है एक ऐसे समाज के निर्माण की जहाँ विविधता का सम्मान हो, लेकिन यह विविधता ऊंच-नीच का कारण न बने। समाज में इंसानियत का रिश्ता हर वर्गीकरण से ऊपर होना चाहिए। जब हम इस सोच को अपने भीतर उतार लेंगे, तभी हम सही मायनों में एक आधुनिक और विकसित समाज कहलाने के हकदार होंगे।
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