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वेट बल्ब तापमान: 28°C या 29°C का वेट बल्ब तापमान भी अस्पताल पहुँचाने के लिए काफी होता है।

वेट बल्ब तापमान: 28°C या 29°C का वेट बल्ब तापमान भी अस्पताल पहुँचाने के लिए काफी होता है।
image source: AI
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Sandeep Vidyarthi21 अगस्त 2026

भारत में जब भी गर्मियां आती हैं, तो हमारा पूरा ध्यान सिर्फ एक ही चीज़ पर होता है - थर्मामीटर का पारा। हम हर सुबह न्यूज़ में या अपने स्मार्टफोन पर चेक करते हैं कि आज का तापमान 40°C है या 45°C। जब पारा 45 डिग्री के पार जाता है, तो हम कहते हैं कि आज लू चल रही है और बाहर निकलना खतरनाक है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी 35°C के तापमान में भी इंसान को 45°C से ज़्यादा बेचैनी और घबराहट क्यों महसूस होती है? इसका सबसे बड़ा कारण हवा में मौजूद नमी यानी उमस है। जब यह साधारण गर्मी इस उमस के साथ मिल जाती है, तो मौसम विज्ञान की भाषा में एक बहुत ही खतरनाक स्थिति पैदा होती है, जिसे वेट बल्ब टेम्परेचर कहा जाता है। यह एक ऐसा अदृश्य खतरा है जो सीधे तौर पर इंसानी शरीर के प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम यानी पसीने को काम करने से रोक देता है और कुछ ही घंटों में जानलेवा साबित हो सकता है।

अगर इसे बहुत ही आसान और आम बोलचाल की भाषा में समझें, तो यह वो तापमान है जो यह बताता है कि हवा में नमी की वजह से हमारा पसीना कितनी आसानी से सूख सकता है। इसे नापने का तरीका बहुत ही पारंपरिक और दिलचस्प है। अगर आप एक साधारण थर्मामीटर लेते हैं, तो वह जो तापमान बताता है उसे ड्राई बल्ब टेम्परेचर कहते हैं। अब अगर आप उसी थर्मामीटर के निचले हिस्से (जहाँ पारा होता है) पर एक पानी में भीगा हुआ सूती कपड़ा लपेट दें और फिर हवा में उसका तापमान नापें, तो उसे वेट बल्ब तापमान कहा जाता है।

 

जब हवा उस गीले कपड़े से टकराती है, तो पानी भाप बनकर उड़ता है और इस प्रक्रिया में थर्मामीटर ठंडा हो जाता है। इसलिए, वेट बल्ब तापमान हमेशा साधारण तापमान से कम या उसके बराबर होता है। लेकिन पेंच यह है कि अगर हवा में पहले से ही बहुत ज्यादा नमी है (जैसे बारिश के मौसम में या तटीय इलाकों में), तो उस गीले कपड़े का पानी भाप बनकर नहीं उड़ पाएगा। ऐसी स्थिति में गीले थर्मामीटर का तापमान भी उतना ही रहेगा जितना सूखे थर्मामीटर का। यही वह बिंदु है जहां खतरा शुरू होता है, क्योंकि हमारा शरीर भी बिल्कुल इसी थर्मामीटर की तरह काम करता है।

प्रकृति ने हमारे शरीर को बहुत ही अद्भुत तरीके से डिज़ाइन किया है। इंसानी शरीर के अंदर का तापमान हमेशा 37°C (98.6°F) के आसपास रहना चाहिए। जब हम कड़ी धूप में या भयंकर गर्मी में काम करते हैं, तो हमारे शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। खुद को ठंडा रखने के लिए हमारा शरीर पसीना छोड़ता है। जब बाहर की हवा इस पसीने को सुखाती है (यानी पसीना भाप बनकर उड़ता है), तो हमारी त्वचा को ठंडक का एहसास होता है और शरीर का अंदरूनी तापमान वापस सामान्य हो जाता है।

लेकिन ज़रा सोचिए, अगर बाहर हवा में पहले से ही इतनी नमी मौजूद है कि वह आपके पसीने को सोखने से ही इंकार कर दे, तब क्या होगा? ऐसी स्थिति में आपके शरीर से पसीना तो निकलेगा, लेकिन वह सूखेगा नहीं। आप चिपचिपा महसूस करेंगे। क्योंकि पसीना नहीं सूख रहा है, इसलिए शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाएगा। नतीजा यह होगा कि आपके शरीर के अंदर भयंकर गर्मी पैदा होने लगेगी और आपका अंदरूनी तापमान 37°C से बढ़कर 40°C या उससे भी ऊपर जाने लगेगा। इसी स्थिति को मेडिकल भाषा में हीट स्ट्रोक कहते हैं। इस दौरान इंसान के ऑर्गन (अंग) काम करना बंद कर सकते हैं, दिल की धड़कन बेतहाशा बढ़ सकती है, और अगर तुरंत मेडिकल मदद न मिले, तो यह स्थिति कुछ ही घंटों में जानलेवा साबित हो सकती है।

वैज्ञानिकों और मौसम विज्ञानियों के अनुसार, इंसानी शरीर के लिए वेट बल्ब तापमान की अधिकतम सैद्धांतिक सीमा 35°C मानी गई है। ध्यान दें, यह साधारण 35°C तापमान नहीं है, बल्कि 100% उमस के साथ 35°C का तापमान है, या फिर लगभग 40°C का तापमान जहाँ उमस 75% के आसपास हो। अगर वेट बल्ब तापमान 35°C तक पहुँच जाता है, तो एक पूरी तरह से स्वस्थ इंसान, जिसके पास पीने के लिए पर्याप्त पानी हो और जो छांव में आराम कर रहा हो, वह भी लगभग 6 घंटे से ज़्यादा जीवित नहीं रह सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि इस तापमान पर हवा हमारे शरीर से गर्मी सोखने के बजाय, हमारे शरीर में गर्मी डालने लगती है।

हालांकि, हाल ही में पेन्सिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक नया और डराने वाला खुलासा किया है। उनके शोध के अनुसार, इंसानों के लिए खतरे की घंटी 35°C पर नहीं, बल्कि 31°C वेट बल्ब तापमान पर ही बजने लगती है। 31°C वेट बल्ब टेम्परेचर पर ही एक स्वस्थ युवा शरीर का कूलिंग सिस्टम हार मानने लगता है। और अगर बात बच्चों, बुजुर्गों, या किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों की हो, तो उनके लिए 28°C या 29°C का वेट बल्ब तापमान भी अस्पताल पहुँचाने के लिए काफी होता है।

भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि हम जलवायु परिवर्तन के इस वेट बल्ब खतरे के बिल्कुल केंद्र में बैठे हैं। हमारे यहाँ सिर्फ रेगिस्तानी या सूखे इलाके नहीं हैं, बल्कि एक बहुत बड़ी तटरेखा और नदियों के विशाल मैदान भी हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल का गंगा का मैदानी इलाका, जहाँ कृषि के कारण भारी मात्रा में पानी वाष्पीकृत होता है, वहां गर्मी और उमस का एक घातक मिश्रण तैयार होता है। इसी तरह मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और ओडिशा जैसे तटीय इलाकों में समुद्र की वजह से उमस हमेशा 70-80% के आसपास रहती है।

जब मई और जून के महीने में इन इलाकों में साधारण तापमान 38°C से 40°C के बीच जाता है और साथ में नमी भी 60% से ऊपर होती है, तब असल में वहां का वेट बल्ब तापमान 30°C से 32°C के खतरनाक स्तर को पार कर जाता है। यही कारण है कि इन महीनों में खेतों में काम करने वाले किसान, रिक्शा चलाने वाले, कंस्ट्रक्शन वर्कर या सड़कों पर काम करने वाले मज़दूर सबसे ज़्यादा हीट स्ट्रोक का शिकार होते हैं। आईपीसीसी की ताज़ा रिपोर्ट्स ने भी साफ चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आने वाले दशकों में भारत और दक्षिण एशिया के कई हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जहाँ गर्मियों में रहना इंसानों के लिए लगभग नामुमकिन हो जाएगा।

इस अदृश्य खतरे से बचने का सबसे पहला कदम है जागरूकता। हमें सिर्फ टेम्परेचर नहीं, बल्कि फील्स लाइक या हीट इंडेक्स को देखने की आदत डालनी होगी, जो तापमान और नमी दोनों को मिलाकर बताया जाता है। जब भी उमस भरी गर्मी हो, तो सिर्फ छांव में खड़ा होना काफी नहीं है, क्योंकि हवा में मौजूद नमी छांव में भी आपका पसीना नहीं सूखने देगी। ऐसे मौसम में सूती और ढीले कपड़े पहनें जो हवा को शरीर तक पहुँचने दें।

पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स (ORS, नींबू पानी, नारियल पानी) का लगातार सेवन करते रहें, भले ही आपको प्यास न लगी हो। अगर आपको अचानक पसीना आना बंद हो जाए, सिर में तेज़ दर्द हो, उल्टियां आएं या चक्कर महसूस हो, तो तुरंत किसी ठंडी जगह (एसी कमरे) में जाएं या शरीर पर बर्फ और ठंडे पानी की पट्टियां रखें। सरकार और प्रशासन के स्तर पर भी हमें शहरों में कूलिंग सेंटर्स बनाने होंगे और कार्यस्थलों पर ऐसी नीतियां लागू करनी होंगी कि उमस भरी दोपहर में बाहर काम करने वाले मज़दूरों को छुट्टी या आराम मिल सके। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की बात नहीं रही, यह हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे चुका है, और वेट बल्ब तापमान उसी की सबसे खतरनाक आवाज़ है जिसे हमें अब गंभीरता से सुनना ही होगा।

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